संपत्ति के लिए मां की हत्या!

न्याय की गुहार लगाता भारतीय

मूल का जर्मन नागरिक

भाई-भाभी द्वारा हत्या किये जाने का जताया संदेह

26 दिसबंर, 2013 संजय कुमार के लिए जीवन का सबसे दुखद दिन था. फोन की घंटी बजी. स्क्रीन पर +91 के बाद का नंबर उभरा वह भारत से फोन था. जर्मनी में अब शाम रात में बदल रही थी. संजय से उनके बड़े भाई बात कर रहे थे, उन्होंने सूचना दी की अब उनकी मां परमजीत त्यागी नहीं रही. उनकी मौत हो गई. यह सुनते ही ठंड के महीने में भी संजय के ललाट पर पसीने की बुंदे छलछलाने लगी. उन्हें जैसे काठ मार गया हो. आनन-फानन में उन्होंने इंदिरापुरम में रहने वाले अपने भाई-भाभी से कहा कि वह भारत पहुंच रहे हैं. मां का अंतिम संस्कार उनके आने के बाद ही होगा. लेकिन उनके भाई-भाभी ने संजय के स्वदेश लौटने का इंतजार करने के बजाय उसी दिन मां का अंतिम संस्कार कर दिया था.

दरअसल, यह केवल संजय की अनुपस्थिति में उनकी मां का अंतिम संस्कार भर का मामला नहीं है. यह मामला वास्तव में संपत्ति हड़पने और मां-बाप के प्रति असंवेदनहिनता की कौन कहे, क्रुरता का है. संजय के भाई-भाभी गाजियाबाद के इंदिरापुरम में रहतेहैं. सोहन सिंह त्यागी और प्रेमजीत त्यागी के दो पुत्र अविनाश कुमारऔर संजय कुमार है. संजय 90 के दशक में जर्मनी में जा कर बस गये तथा वर्तमान में वे महिंद्रा ग्रुप फ्रॉजिंग यूरोप एजी के लिए काम करते हैं और पिता सोहन त्यागी अपने गांव बुलंदशहर में तथा मां गाजियाबाद जिले के ही शालीमार गार्डेन में रहती थी. परिवार बिखरा था और परिवार में सबकुछ ठीक नहीं था. हमेशा कलह तिस पर बुजुर्ग त्यागी दंपत्ति को उनके अपने खर्चे-खेवे के लिए भी मोहताज हो जाना पड़ा. सुनीता बार-बार सास-ससुर पर गांव की जमीन बेचने के लिए दबाव डालती रहती. पिता कभी-कभी जमीन बेच कर पैसे देते रहते. बावजूद इसके सुनीता-अविनाश ने मां-बाप की देखरेख बंद कर दी.

जब इसकी खबर संजय को मिली तो संजय प्रतिमाह अपने बुजुर्ग माता-पिता के भरण पोषण के लिए मां के पास अपने करीबियों व दोस्तों के माध्यम से लगातार पैसे भेजते रहे. मां उन्हीं पैसे में से थोड़ा-थोड़ा बचत कर दिल्ली के किराड़ी सुलेमान इलाके के करण विहार में 75 गज का एक जमीन का प्लाट खरीदा जो आबादी वाला है. अविनाश और सुनीता को इस प्लाट के खरीदे जाने की जैसे ही जानकारी मिली, वे बुजुर्ग मां-बाप पर पुनः दबाव बनाने लगे कि या तो वे इस प्लाट को बेच कर पैसे उन्हें दे दें या फिर प्लाट ही सुनीता के नाम कर दें. लेकिन अविनाश-सुनीता का कोई भी हथकंडा काम नहीं आ रहा था. इसी बीच 26 दिसबंर, 2013 को परमजीत त्यागी की संदेहास्पद स्थिति में मौत हो गई.जब मां के अंतिम संस्कार के लिए संजय जर्मनी से इंदिरापुरम आए तो उन्हें भी अविनाश-सुनीता ने जबरन सभी पैतृक संपत्ति उन्हें हस्तांतरित करने को कहा. संजय द्वारा उनका प्रस्ताव ना मानने पर उन्हें जान से मारने की धमकी तक दी गई लेकिन संजय जैसे-तैसे वापस जर्मनी लौट गये. वे भारतीय मूल के जर्मन नागरिक है.

संजय को संदेह है कि उनकी मां की मौत स्वाभाविक नहीं हुई बल्कि उनके बड़े भाई-भाभी ने साजिशन उनकी हत्या की या करवाई है. वह मां के शव की जांच कराना चाहते थे ताकि मौत के कारणों का स्पष्ट कारण पता चल सके. इस बावत वह अविनाश-सुनीता के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए बीते चार वर्षों से पापड़ बेल रहे हैं.

एक तरफ केंद्र सरकार अनिवासी भारतीय को दोहरा नागरिकता और उन्हें तमाम तरह की सुविधाएं देने की बात करती है लेकिन ऐसे मामले में सरकार की ओर से कोई गंभीर कदम नहीं उठाया जाता. संजय ने अपने वकील के माध्यम से जर्मनी में भारत के काउंसुल जनरल रविश कुमार के माध्यम से गुहार लगाई की उनकी मां की हत्या के मामले की निष्पक्ष जांच करायी जाए तथा अविनाश-सुनीता के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए. लेकिन आज लगभग चार साल होने को है लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा. विदेश मंत्रालय के ओआईए द्वितीय के निदेशक एम एस कान्याल द्वारा 07 अगस्त 2017 को गाजियाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हरिनारायण सिंह को पत्र लिख मामले की जांच करने और एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था. लेकिन वह निर्देश भी फाइलों में सिमट कर रह गई.

बीते कुछ वर्षों में देखा गया है कि संपत्ति पर कब्जे या हड़पने के लिए बुजुर्गों की प्रताड़ना और हत्या तक के मामले में बेहतहाशा वृद्धि हुई है. लेकिन इस तरह के मामलों की जांच को लेकर प्रशासनिक सुस्ती ऐसी परिपाटी को बढ़ावा दे रही है. इसी तरह जब हम अप्रवासी भारतीयों को जमीन से जोड़ने अर्थात उनके साथ संबंधों को प्रगाढ़ करने के दावे करते हैं, तब आवश्यक हो जाता है कि स्वदेश से हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की जाए. लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है.

दिल्ली स्थिति संजय के वकील अनुज प्रकाश श्रीवास्तव और रुपेश त्यागी की ओर से अविनाश-सुनिता के खिलाफ कानूनी नोटिस भी भेजा गया था. दरअसल, घटना के ज्यादा दिन बीतने के बाद निष्पक्ष जांच की गुंजाइशें भी कम हो जाती है. सबुत व प्रमाण समाप्त हो जाते हैं. ऐसे में आरोपी संदेह का लाभ पा जाते हैं और न्याय अधूरा रह जाता है. संजय के वकीलों के मुताबिक अविनाश-सुनीता पर संपत्ति हड़पने, प्रताड़ित करने, साजिश रचने तथा हत्या करने के मामले भारतीय दंड संहिता की धारा 388/351/350/327/503/420/506/120बीके तहत केस दर्ज किया जाना चाहिए.

जर्मनी से संजय के वकील डॉ पीटर एंड्रस, उलरिच क्रूज्वे, युर्गन केलेन्क इस मामले में कानूनी कार्रवाई करते रहे हैं. संजय इस बारे में कहते हैं कि उन्हें पूरा विश्वास था कि भारत सरकार उनके मामले को गंभीरता से लेगी और उन्हें न्याय मिलेगा. लेकिन लगातार चिट्ठी-पत्री करने के बाद भी अब तक एक अदद एफआईआर तक दर्ज नहीं हो पाया है. वह दुःखी मन से कहते हैं कि निराश जरूर हूं लेकिन नाउम्मीद कत्तई नहीं. उन्हेंने कहा कि हमें भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है और उम्मीद करता हूं कि उनके मां के मौत के मामले निष्पक्ष जांच होगी तथा उन्हें न्याय मिलेगा. संजय कहते हैं कि यह उनके लिए काफी त्रासदी भरा है कि वह मां की मौत की जांच की मांग कर रहे है और उस व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराना चाहते हैं जो उन्हीं की तरह उसी मां का बेटा है. सिर्फ संपत्ति के लिए कोई बेटा इतना कैसे गिर सकता है कि वह अपनी मां तक की जान का दुश्मन बन जाए. हालांकि इस मामले में गाजियाबाद पुलिस प्रशासन खामोशी अख्तियार किये हुए है.

 

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